श्री गणेश मंदिर - गांव के बीच गोंडवाना राजा ने श्री गणेश मंदिर का निर्माण सन 188 में आरम्भ किये थे, जो सन 646 में पूर्ण हुआ, जो शिलालेख में वर्णित है। गणेश मंदिर के सामने शमी वृक्ष है, जो कि गणेश जी का महत्त्व भारत प्रसिद्द है।
दानदाता- नेवसा वाले मालगुजार बसंत राव करकरे ने 1 लाख 11 हजार 101 रुपए मंदिर हेतु दान दिए है। दानदाता भी सहयोग राशि दिए हैं श्री बृजमोहन अग्रवाल (मंत्री) 5 लाख रुपए एवं श्री दयालदास बघेल (विधायक) 2 लाख रुपए मंदिर में दान दिए हैं, श्री ताराचंद साहू (लोकसभा सदस्य) हैंडपंप के लिए राशि दिए, गणेश मंदिर के सामने सभामंडप बनाया गया। गणेश जी में चांदी का सूढ़ श्री छन्नू सोनी द्वारा दिया गया है।
जीर्णोध्दार- बहुत दूर दूर से आदमी दर्शन करने एवं मनौती में मनाने आते हैं। सन 1880 तथा सन 1936 में मरम्मत किया गया था, फिर बाद में 2010 में वृहद् रूप से मरम्मत कराया गया है। मंदिर भी अष्ट कोणीय बना है।
सभामंडप- सभामंडप में शिव पंचायत, राधा कृष्ण और राम जानकी लखन जी और हनुमान जी का मूर्ति स्थापित किया गया है और जो गणेश जी के आठ प्रसिद्ध मूर्तियां है, उनकी भी चित्र लगाया गया। दिनांक 20/01/2013 को इनका प्राणप्रतिष्ठा किया गया है।
शमी वृक्ष- इस वृक्ष के पत्ते को हवन पूजन के लिए दूर-दूर के लोग आकर ले जाते हैं इनके बिना पूजा-पाठ अधूरा माना गया है। शमी वृक्ष की मान्यता शनि देव के रूप में है।
अष्टकोणीय कुआँ- मंदिर के दक्षिण भाग में अष्टकोणीय कुआँ है।
पर्यटन स्थल- गणेश मंदिर को शासन द्वारा पर्यटन स्थल घोषित किया गया है।
पुरातात्विक प्रमाण- पहले श्री गणेश मंदिर के सामने श्री हनुमान जी का चबूतरा था, जिसे गणेश मंदिर के जीणोद्धार के समय सभामंडप में लेजाने के लिए तुड़वाया गया। जहाँ पर अष्टकोणीय सुरंग जिसके अंदर सीढ़ी थी निकला, जिसे अभी बंद कर दिया गया है।
अष्टविनायक गणेश जी- अष्टकोणीय में मयूरेश्वर गणेश जी, चिंतामणि गणेश जी, गिरजात्मज गणेश जी, विघ्नेश्वर गणेश जी, बल्लालेश्वर गणेश जी, महागणपति गणेश जी, श्री वरदविनायक गणेश जी एवं श्री सिद्धिविनायक गणेश जी की मूर्ति स्थापित किये हैं।
(1). मयूरेश्वर गणेश जी- ग्राम मोरगांव पुणे से 40 किलोमीटर दूरी पर मोरगांव में स्थित गणपत्य संप्रदाय का आद्यपीठ है, अत्यन्त जाग्रत इस देव स्थान की गणना स्वयंभू अष्ट विनायकों में है। प्रतिमा के अगल-बगल धातु की सिद्धि बुद्धि की प्रतिमाएं हैं। 14वीं शताब्दी में ब्रह्म कमंडलु तीर्थ से यह देव मूर्ति प्राप्त हुई है, गणपत्य तीर्थों में इस क्षेत्र को भूस्वानंद क्षेत्र के नाम से मान्यता है।
(2). चिंतामणि गणेश जी- ग्राम थेउर पुणे से 14 मील दूरी पर स्थित इस देव स्थान की गणना स्वयंभू अष्टविनायकों में है। प्रतिमा चिचवड के श्री मोरवा गोसाली के उग्र तपस्चर्या से श्री गणेश जी व्याघ्र के रूप में प्रकट हुए थे। प्रतिमा की सूढ़ बाई ओर एवं पूर्वाभिमुख है, ब्रह्मा जी ने सृष्टि के कार्य में आने वाले विघ्नों के नाश के लिए इसकी इसकी स्थापना की थी ,ऐसा प्राचीन ग्रंथ में वर्णित है।
(3). गिरजात्मज गणेश जी- ढेलयाद्रि पुणे से 60 मील दूरी पर ढेलयाद्री में स्थित इस देव स्थान की गणना स्वयंभू अष्टविनायको में होती है, यह स्थान पहाड़ खोदकर तैयार किया गया है, इसके आसपास बौद्ध गुफाएं भी है, यहां पर प्रतिमा एक ताखे के भीतर है।
(4). विघ्नेश्वर गणेश जी- अत्यंत रमणीय स्थान लेह्याद्री के पास में ओझर में स्थित अष्टविनायको में यहां के विघ्नेश्वर जी की बड़ी प्रतिष्ठा है, यहां के मंदिर अति सुंदर है।
(5). बल्लालेश्वर गणेश जी- प्राचीन काल से जाग्रत रहे देवस्थान पाली, जिला कुलाबा में स्थित है, इस का प्राचीन नाम पल्लीपुर है, इसकी गणना स्वयंभू अष्टविनायक में है, जिसका उल्लेख गणेश पुराण एवं मुद्गल पुराण में है, मंदिर की रचना ऐसी है कि सूर्योदय होते ही सूर्य की किरणें सभामंडप से होकर मूर्ति पर पड़ती है।
(6). महागणपति- (ग्राम- राजन) पुणे से 31 मील दूरी पर राजन गांव में स्थित इस गणेश का नाम महोत्कट भी है, इस देव स्थान की गणना स्वयंभू अष्टविनायको में है। यहाँ नीचे तहखाने में इसकी एक छोटी सी मूर्ति है वही असली मूर्ति है। मंदिर पूर्वाभिमुख है और रचना ऐसी है कि उत्तरायण और दक्षिणायन की मध्य काल में सूर्य की किरणे निश्चित रूप से मूर्ति पर पड़ती है, इस क्षेत्र को मणिपुर क्षेत्र कहा जाता है।
(7). श्री वरदविनायक गणेश जी- महड़ के श्री वरदविनायक अष्टविनायक को में प्रसिद्ध है, इस मंदिर की स्थापना ऋग्वेद के दूसरे मंडल के मंत्र दृष्टा श्री गृत्समद ने की गृत्समद ऋषि गणपत्य संप्रदाय के आद्य प्रवर्तक है।
(8). श्री सिद्धिविनायक गणेश जी- सिद्धटेक, जिला महाराष्ट्र स्थित सिद्धिविनायक श्री गणेश जी स्वयंभू है, यह स्थान ऐतिहासिक महत्व का केंद्र है।