मिट जाएगा तेरा वजूद,
फिर भी तेरी पहचान होगी,
मरने के बाद भी तेरी छाती पर
तिरंगे की शान होगी
और मेरा क्या है!
मुझे तो राह चलते मुसाफिर,
छोड़ आएंगे दो गज जमीन के नीचे,
तू अकेला भी कुर्बान होगा दुनिया में
तो पूरे देश की छाती में तेरी आन होगी,
तुझे देखकर मुझे भी हर बार
माँ के कर्ज से उतरने का मन करता है
लेकिन सुविधाओं की दरख्तों में
खो गया है मेरा जीवन,
घाटियों में भी तेरी जिंदगी आलिशान होगी,
तेरी हर शहादत पे
मैं भी सोचता हूँ कि
वह मरना ही क्या
सस्ते में जान जाए,
मौत हो ऐसी
कि महफ़िल भी बुरा मान जाए,
पर मैं वही का वही हूँ
और तेरे  कदम पे
सारी दुनिया मेहरबान होगी।।
 
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