//मैं गदहा घोंचू हॅूं//
मैं गदहा घोंचू हॅूं
कुछ समझ नहीं पाता
मैं भारत को आजाद समझता
वे आजादी के लगाते नारे
जिसे मैं बुद्धिजीवी कहता
उनसे वे निभाते भाईचारे
अपने वतन को गाली देने वाला
आँखों का तारा हो जाता
मैं धरती का सेवक ठहरा
वे कालेज के बच्चे
मेरी सोच सीधी-सादी
वो तो ज्ञानी सच्चे
माँ-बाप को घाव देने वाला
श्रवण कुमार कहलाता
मैं कश्मीर का निष्कासित पंडित
वे कश्मीर के करिंदे
मेरे आँसू झर-झर झरते
पोंछ सके न परिंदे
जो आता पास मेरे
सम्प्रदायिक हो जाता
मैं लोकतंत्र बिछा चौसर
वे शकुनी के फेके पासे
दिल्ली की गद्दी युधिष्ठिर
फँस गये उसके झाँसे
धृतराष्ट्र का राजमोह
दुर्योधन को ही भाता
-रमेशकुमार सिंह चौहान
 
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