दो संत भाई थे, जब नाग देव द्वारा उनका पीछा किया गया, तब एक भाई नवागढ़ की ओर आया तो नागदेव भी उनका पीछा करते नवागढ़ आए।

जब नागदेव ने संत को डसा, तो संत और नागदेव दोनों की मृत्यु हो गई, फिर दोनों को गुप्ता पारा चौक पर दफन कर दिया गया और चबूतरा बना दिया गया, समय समय पर वहां पर होम-धूप दिया जाता है।
पहले चबूतरा कच्चा था, अब उसे पक्का बना दिया गया है, इसी तरह दूसरा संत रतनपुर भागते गए, उसेे दूसरे नागदेव ने दौड़ाया और दोनों की मृत्यु हो गई ऐसा सयाने लोग बताते हैं।
 
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