झन ले ये गाॅंव के नाव
जेखर गुन ल हमन गावन,
जेखर महिमा हमन सुनावन,
वो गाॅंव हो गेहे बिगड़हा,
जेला देख के हम इतरावन,
कहत रहेन शहर ले बने गाॅंव,
बाबू एखर झन ले नाव,
दूसर के चीज ल दूसर बाॅंटय,
उल्टा चोर कोतवाल ल डाॅंटय,
थोरकिन म झगरा होवत हें,
दूसर मन बर्राय सोवत हें,
अनपढ़ मन होशियार हें,
साक्षर मन गॅंवार हें,
लइका मन हें अतका सुग्घर,
दिन भर खावंय मिक्चर,
दिन के तो पढ़े ल नई जावंय,
रात के देखयं पिक्चर,
गाॅंव बिगड़इया मनखे के,
नाव हवय भोंगा,
ओखर ले बाॅंचगे तेला,
पूरा करत हे पोंगा,
इही हाल हे गाॅंव के गाॅंव,
झन ले बाबू ये गाॅंव के नाव।।
 
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